सब्जी उत्पादक किसानों को सपोर्ट सिस्टम से सब्जी उत्पादन पर मिलेगा 50 प्रतिशत का अनुदान

सब्जी उत्पादक किसानों को सपोर्ट सिस्टम से सब्जी उत्पादन पर मिलेगा 50 प्रतिशत का अनुदान

बेल वाली सब्जियां खीरा, लौकी, तोरई, करेला और टिण्डा की खेती में होगा फायदा

बीकानेर, 14 सितम्बर। जिले के किसानों के लिए एक बड़ी राहत और खुशखबरी है। मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत अब सब्जी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए किसानों को सपोर्ट सिस्टम स्थापित करने पर सरकार की ओर से अनुदान दिया जा रहा है। उप निदेशक उद्यान अनुसंधान एटीसी प्रेमाराम ने बताया कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य आधुनिक एवं उन्नत तकनीक अपनाकर सब्जी उत्पादन को बढ़ावा देना है।

उद्यान विभाग के सहायक निदेशक मुकेश गहलोत ने बताया कि योजना के तहत सपोर्ट सिस्टम की इकाई लागत 20 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर निर्धारित की गई है। इस निर्धारित लागत पर किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान देय होगा। एक लाभार्थी किसान को न्यूनतम 0.40 हेक्टेयर से लेकर अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र तक प्रोरेटा बेसिस (आनुपातिक) पर अनुदान का लाभ दिया जा सकेगा। जिले में कृषक श्रेणीवार कुल 150 हेक्टेयर का लक्ष्य प्राप्त हुआ है। यह लाभ टमाटर एवं बेल वाली फसलों यथा खीरा, लौकी, तोरई, करेला और टिण्डा के लिए मिलेगा। सपोर्ट सिस्टम के उपयोग से सब्जी की फसलों में पौधों को उचित सहारा मिलता है। इससे न केवल फसल का बेहतर विकास होता है, बल्कि उच्च गुणवत्ता और अधिक उत्पादन प्राप्त करने में भी भारी सहायता मिलती है। किसानों को आधुनिक तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
क्या है प्रक्रियाः योजना का लाभप्राप्त करने के इच्छुक किसान संबंधित उद्यान विभाग कार्यालय अथवा अपने क्षेत्र के कृषि पर्यवेक्षक उद्यान से संपर्क कर आवश्यक जानकारी एवं आवेदन प्रक्रिया की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। किसानों को सपोर्ट सिस्टम में उपयोग की गई सामग्री के बिल प्रस्तुत करने होंगे, जिसके पश्चात सत्यापन के आधार पर किसानों को लाभान्वित किया जाएगा।

सपोर्ट सिस्टम के फायदे

गहलोत ने बताया कि फल जमीन से संपर्क में नहीं आते, खराब नहीं होते-पैदावार भी ज्यादा सपोर्ट सिस्टम बांस, तार या जाली का ढांचा होता है। इससे बेल को सही सहारा मिलता है। बेल जमीन पर फैलने के बजाय ऊपर बढ़ती है। इससे कम जगह में अधिक पैदावार होती है। फल जमीन के संपर्क में नहीं आते, इसलिए सड़ने व खराब होने की आशंका कम रहती है। पौधों में हवा और धूप का बेहतर संचार होता है। फल की गुणवत्ता- आकार बेहतर रहता है। तोड़ाई, निराई-दवा का छिड़काव आसान।

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