The complete story of the 500-year-old Rajal Baisa Dham in Samna

समना के 500 साल प्राचीन राजल बाईसा धाम की पूरी कहानी

लाडनूं का समना: जहां माता के साथ शेर की पूजा भी होती है, विशाल भजनों और झांकियों का आयोजन 19 अक्टूबर को,

समना के 500 साल प्राचीन राजल बाईसा धाम की पूरी कहानी

The complete story of the 500-year-old Rajal Baisa Dham in Samna

लाडनूं ()। तहसील के ग्राम समना स्थित श्री राजन बाईसा धाम मंदिर में नवरात्रा महोत्सव पर श्री राजल बाईसा का विशाल मेला आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत 19 अक्टूबर को आयोजित होने वाले विशेष भजन-झांकियों के कार्यक्रम के पोस्टर का विमोचन किया गया। मेघराज सिंह रोयल, रूपसिंह समना, श्योपाल सिंह गुलाबजी चाय जयपुर, शिम्भुसिंह, भवानी सिंह आदि ने इस पोस्टर का विमोचन किया।

इस प्रकार रहेगा राजल बाईसा मंदिर का कार्यक्रम

राजल बाईसा मंदिर समना में ग्राम समना, रेवाड़ा व ड़ोबरा का बास के सभी ग्रामवासियों की ओर से आयोजित हो रहे इस कार्यक्रम के तहत 19 अक्टूबर सोमवार को श्री राजल बाईसा धाम समना में विशाल भक्ति संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। आरती, झांकियों और जागरण का विशेष कार्यक्रम इस अवसर पर आयोजित होगा। इसके निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 19 अक्टूबर को सायं 7.15 बजे आरती होगी। 8.15 बजे से झांकियों का प्रदर्शन किया जाएगा। यह झॉंकियां धर्मेंद्र साईं ग्रुप द्वारा प्रस्तुत की जाएंगी। रात्रि 9.15 बजे से जागरण में सुमधुर भजनों का कार्यक्रम रहेगा। इस अवसर पर श्री जगदम्बा म्यूजिकल ग्रुप जोधपुर की ओर से दी जाने वाली प्रस्तुतियों में सिंगर प्रकाश दाधीच, सिंगर अर्जुन दाधीच, सिंगर हेमलता वैष्णव एवं सिंगर कोमल नथानी अपनी सुकर्ण आवाज से भजनों की स्वर लहरियां बिखेरेंगी। साथ ही डांसर दुर्गा परिहार भी अपनी नृत्यकला की प्रस्तुति देंगी।

राजल बाईसा कौन थी और मान्यता क्यों है

समना गांव में स्थित यह राजल बाईसा धाम मंदिर करीब 500 साल प्राचीन है। इस मंदिर के नीचे करीब 2100 बीघा जमीन डोबरों का बास में बताई जा रही है। यहां मंदिर में राजल बाईसा और उनके शेर की पूजा की जाती है। बताया जाता है कि एक बार राजल बाईसा सिंह पर सवार होकर दिल्ली जा रही थी, तब उन्होंने अपने सिंह को यहां छोड़ दिया था। राजल बाईसा को करणी माता के अवतार के रूप में माना जाता है। इनका जन्म गुजरात के ध्रांगध्रा के गांव चराड़या (वर्तमान जिला सुरेन्द्र नगर) में वहां के वचनसिद्ध ‘वाचा’ समुदाय के सरस्वती उपासक उदयराज चारण के घर में विक्रम संवत् 1595 माघ सुदी सप्तमी को राजल बाईसा का जन्म हुआ। ये अकबर के समकालीन थीं। देशनोक की करणी माता के ज्योतिर्लीन होने के दस महीने बाद ही बालिका के रूप में चारणकुल में इनका जन्म हुआ और इन्हें करणी माता का अवतार मान लिया गया। बचपन से ही गुणवान और चमत्कारी होने सेश्री राजल बाईसा की कीर्ति पश्चिमी भारत, कच्छ सौराष्ट्र, राजस्थान, सिन्ध, दिल्ली आदि क्षेत्रों में तेजी से फैल गई।

राजल माता द्वारा अकबर से नवरोजा छुडवाना

राजल बाईसा को करणी माता के पूर्णावतार के रूप में माना जाने लगा। उनके समय में बादशाह अकबर द्वारा चलाई जाने वाली नवरोजा प्रथा समूचे राजपूताने पर कलंक थी। इसमें प्रत्येक नवविवाहिता की डोली पहले नौ दिनों तक उनके पास रहनी आवश्यक होती थी। इस नवरोजा प्रथा का अंत राजल बाईसा ने करवाया। पृथ्वीराज राठौड़ के सोरठे, दयालदास की ख्यात, वाचा चारणों के रावल की बही, मुंशी देवी प्रसाद के ग्रंथ राज रसनामृत, डा. लुइजिपिओ तैसिस्तोरि, रावत सारस्वत, राजवी अमरसिंह आदि के ग्रंथों से इसकी पुष्टि होती है।

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