“जहां राधा गोविंद है वो जगह है भगवान कान्हा का वृंदावन ”
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जाने .. भगवान श्री गोविंद देव जी के जयपुर पधारने का इतिहास ?
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जितेन्द्र सिंह शेखावत
5 सितम्बर, जन्माष्टमी
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चैतन्य महाप्रभु के माधव गौड़ीय सम्प्रदाय की मान्यता रही है कि जहां पर भगवान राधा गोविंददेव विराजते है वहीं पर है वृदावन ।” यहीं वजह रही कि जयपुर को वृंदावन का दूसरा स्वरूप माना जाता है ।
भगवान .गोविंद देव का प्राकट्य सन् 1536 में वृंदावन के गोमा टीले से हुआ था । श्री कृष्ण के प्रपौत्र व मथुरा नरेश वज्रनाभ ने काले पत्थर की शिला से गोविंद का यह विग्रह करीब पांच हजार साल पहले बनवाया था । काले पत्थर की शिला पर ही कंस ने माता देवकी की सात संतानों को मारा था।
वज्रनाभ ने पड़दादी से गोविंद का स्वरूप सुनकर कारीगरों से यह विग्रह बनवाया था। पुरानी बस्ती में विराजे गोपीनाथ और करौली के मदन मोहन भी गोविंद विग्रह के साथ बने हैं ।
गोबिंद देवजी के विग्रह को कृष्ण की साक्षात छवि का दर्शन माना जाता है। गोविंद का मुख- मंडल, कटि व चरण साक्षात कृष्ण के जैसे ही हैं।
दसवीं शताब्दी में आक्रांताओं के डर से ब्रजवासियों ने गोविंद देव जी के विग्रह को वृदांवन में भूशायी कर दिया था ।
पन्द्रहवीं सदी में चैतन्य महाप्रभु के निर्देश पर रूप गोस्वामी व सनातन गोस्वामी आदि शिष्यों ने वृंदावन के गोमा टीले से गोविंद
विग्रह निकाला और पर्णकुटी में गोविंद की सेवा पूजा करने लगे । बाद में आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में लाल पत्थर का गोविंद देव मंदिर बनवाया ।
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यूं आई थी राधारानी
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गोविंददेव जी के वामांग में विराजित राधारानी को गोविंद के प्रकट होने के सत्रह साल बाद उड़ीसा से लाकर विराजमान किया गया था ।
उड़ीसा का वृहदभानु कभी वृंदावन में रहकर राधारानी की सेवा पूजा करते थे । आंक्रांताओ के हमले के समय हमला हुआ तब वे राधारानी को उड़ीसा ले गए । उसके बाद राधारानी जगन्नाथ पुरी में भी रही थीं ।
वृदावन में गोविंद का प्राकट्य हुआ तब वृहद भानु का वंशज पुरुषोत्तम राधारानी को वृदावन लाए ।
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औरंगजेब का फरमान
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सन् 1699 में औरंगजेब के निर्देश पर मथुरा के मुगल फौजदार अबुदुन्नी खान ने वृंदावन के मंदिरो को तोड़ने का फरमान जारी किया तब रूप गोस्वामी के शिष्य शिवराम गोस्वामी गोबिंद विग्रह को बैलगाड़ी से राधा कुंड होते हुए कामां लाए । सालो बाद आमेर राज्य में गोनेर के पास गोविंदपुरा रोपाड़ा में राधा गोविंद देव का विग्रह रहा । बाद में आमेर घाटी में निर्मित कनक वृंदावन में राधा गोविंद देव जी के विग्रह को लाया गया ।
सवाई जयसिंह ने सिटी पैलेस परिसर में बने सूरज महल में राधा गोविंद देव जी को कनक वृंदावन से लाकर विराजित किया ।
सवाई जयसिंह ने …..राजमुद्रा में श्री गोविंद देव चरण, सवाई जयसिहं शरण, लिखवाया ।
राधारानी की सेवा के लिए जयसिंह ने विशाखा सखी एवं सवाई प्रताप सिंह ने ललिता सखी की प्रतिमा मंदिर में स्थापित की ।
उस समय गोविंद देव जी की सवा लाख रुपये सालाना की जागीर व कई गांव थे। सवाई ईश्वरी सिंह के समय प्रति हजार आमदनी के पेटे सवा रुपया गोविंद देवजी के निमित्त किया गया ।
जयपुर के तत्कालीन महाराजा के जन्म दिवस पर वे जितने साल के होते उतनी ही स्वर्ण मुद्रा मंदिर में चढ़ाई जाती थी।
जितेन्द्र सिंह शेखावत
चैतन्य महाप्रभु के माधव गौड़ीय सम्प्रदाय की मान्यता रही है कि जहां पर भगवान राधा गोविंददेव विराजते है वहीं पर है वृदावन ।” यहीं वजह रही कि जयपुर को वृंदावन का दूसरा स्वरूप माना जाता है ।
भगवान .गोविंद देव का प्राकट्य सन् 1536 में वृंदावन के गोमा टीले से हुआ था । श्री कृष्ण के प्रपौत्र व मथुरा नरेश वज्रनाभ ने काले पत्थर की शिला से गोविंद का यह विग्रह करीब पांच हजार साल पहले बनवाया था । काले पत्थर की शिला पर ही कंस ने माता देवकी की सात संतानों को मारा था।
वज्रनाभ ने पड़दादी से गोविंद का स्वरूप सुनकर कारीगरों से यह विग्रह बनवाया था। पुरानी बस्ती में विराजे गोपीनाथ और करौली के मदन मोहन भी गोविंद विग्रह के साथ बने हैं ।
गोबिंद देवजी के विग्रह को कृष्ण की साक्षात छवि का दर्शन माना जाता है। गोविंद का मुख- मंडल, कटि व चरण साक्षात कृष्ण के जैसे ही हैं।
दसवीं शताब्दी में आक्रांताओं के डर से ब्रजवासियों ने गोविंद देव जी के विग्रह को वृदांवन में भूशायी कर दिया था ।
पन्द्रहवीं सदी में चैतन्य महाप्रभु के निर्देश पर रूप गोस्वामी व सनातन गोस्वामी आदि शिष्यों ने वृंदावन के गोमा टीले से गोविंद
विग्रह निकाला और पर्णकुटी में गोविंद की सेवा पूजा करने लगे । बाद में आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में लाल पत्थर का गोविंद देव मंदिर बनवाया ।
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यूं आई थी राधारानी
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गोविंददेव जी के वामांग में विराजित राधारानी को गोविंद के प्रकट होने के सत्रह साल बाद उड़ीसा से लाकर विराजमान किया गया था ।
उड़ीसा का वृहदभानु कभी वृंदावन में रहकर राधारानी की सेवा पूजा करते थे । आंक्रांताओ के हमले के समय हमला हुआ तब वे राधारानी को उड़ीसा ले गए । उसके बाद राधारानी जगन्नाथ पुरी में भी रही थीं ।
वृदावन में गोविंद का प्राकट्य हुआ तब वृहद भानु का वंशज पुरुषोत्तम राधारानी को वृदावन लाए ।
httpswww.youtube.comwatchv=QW2dJ6r37Dk
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औरंगजेब का फरमान
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सन् 1699 में औरंगजेब के निर्देश पर मथुरा के मुगल फौजदार अबुदुन्नी खान ने वृंदावन के मंदिरो को तोड़ने का फरमान जारी किया तब रूप गोस्वामी के शिष्य शिवराम गोस्वामी गोबिंद विग्रह को बैलगाड़ी से राधा कुंड होते हुए कामां लाए । सालो बाद आमेर राज्य में गोनेर के पास गोविंदपुरा रोपाड़ा में राधा गोविंद देव का विग्रह रहा । बाद में आमेर घाटी में निर्मित कनक वृंदावन में राधा गोविंद देव जी के विग्रह को लाया गया ।
सवाई जयसिंह ने सिटी पैलेस परिसर में बने सूरज महल में राधा गोविंद देव जी को कनक वृंदावन से लाकर विराजित किया ।
सवाई जयसिंह ने …..राजमुद्रा में श्री गोविंद देव चरण, सवाई जयसिहं शरण, लिखवाया ।
राधारानी की सेवा के लिए जयसिंह ने विशाखा सखी एवं सवाई प्रताप सिंह ने ललिता सखी की प्रतिमा मंदिर में स्थापित की ।
उस समय गोविंद देव जी की सवा लाख रुपये सालाना की जागीर व कई गांव थे। सवाई ईश्वरी सिंह के समय प्रति हजार आमदनी के पेटे सवा रुपया गोविंद देवजी के निमित्त किया गया ।
जयपुर के तत्कालीन महाराजा के जन्म दिवस पर वे जितने साल के होते उतनी ही स्वर्ण मुद्रा मंदिर में चढ़ाई जाती थी।
[3:51 pm, 4/9/2026] Subhash Ji: छात्रवृत्ति पोर्टल पर बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए अंतिम अवसर
बीकानेर, 3 सितम्बर। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग विभाग के संयुक्त निदेशक ने बताया कि विभाग द्वारा संचालित उत्तर मैट्रिक छात्रवृति योजनान्तर्गत विद्यार्थियों शैक्षणिक सत्र 2024-25 में विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति पोर्टल पर बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज करने के लिए शैक्षणिक सत्र 2025-26 में अन्तिम दिनांक 15 सितम्बर को बढ़ाकर 15 अक्टूबर कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि विद्यार्थियों के लिए छात्रवृति पोर्टल पर बायोमैट्रिक उपस्थिति दर्ज कराने का अंतिम अवसर होगा।
