क्या अंदाज
क्या अंदाजे बयां !
वो महज एक अदाकार नहीं थे।
उनके बोल और सोच में एक सूफियाना लहजा ,एक दार्शनिक पुट था
वे बीकानेर के सांसद थे-
मूंगफली खरीद को लेकर किसानों और सरकार में ठन गई थी
उनकी ही पार्टी सरकार में थी /लेकिन धर्मेंद्र किसानो के हक में खड़े हो गए
किसान संघ के एक नेता ने मुझे धर्मेंद्र से फ़ोन पर कनेक्ट किया –
धर्मेंद्र बोले –
जिस मुल्क का बादशाह फ़क़ीर होता है
उस रियासत का हर शहरी बादशाह होता है
उन्होंने अपनी जेब से भी फसल खरीद में मदद की कोशिश की
वो 70 का दशक था
यादों की बारात फिल्म का एक डायलॉग बहुत मशहूर हुआ –
‘कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा’
लेकिन उसके बाद धर्मेंद्र ने एक इंटरव्यू में अपने इस बोल पर दुःख व्यक्त किया ,कहने लगे मुझे ऐसा नहीं कहना नहीं चाहिए था। कुत्ते तो वफादार होते है।
धर्मेंद्र सिनेमा के सितारे थे, 2004 में सियासत में आ गए।
बीकानेर से सांसद चुने गए
मरुस्थल के हर गांव कस्बे में जीव दया का जीवन का अहम हिस्सा है
लोग श्वानो को भोजन खुराक देते है और पकड़ने नहीं देते
बीकानेर में भी अच्छी संख्या में है
धर्म जी जब चुनाव प्रचार में निकले तो श्वान डरे नहीं
उन्हें पता था धर्मेंद्र ऐसे नहीं है कि वे श्वानो के प्रति ऐसे भाव रखे
वो 2004 का वक्त था ,-तब न तो आदमी आदमी में अदावत ऐसी थी ,न कोई कुतो को गाडी के पीछे बांध कर खींचने के मंजर देखे जाते थे
भारतीय सिनेमा की इस अजीम हस्ती के निधन पर हर व्यक्ति शोकाकुल है
फिजा में ग़मो शोक के गर्दो गुब्बार हैं।
शत शत नमन !
सादर
वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ साहब की कलम से✍️
