तानसेन ने कहा, “ये ज़रा कठिन बात है। गुरू मेरे जीवित हैं, लेकिन उन्हें बुलाना मुश्किल है। वे फ़क़ीर आदमी हैं।”

💚तानसेन के गुरू हरिदास💚
(नोंध:- यह गुरू हरिदास जी निम्बार्कीय वैष्णव थे।)
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अकबर ने तानसेन को एक बार कहा कि, “तुम्हरा संगीत अपूर्व है। मैं सोच भी नहीं सकता कि इससे श्रेष्‍ठ संगीत कहीं हो सकता है। या कोई इससे श्रेष्ठ संगीत पैदा कर सकेगा। लेकिन एक प्रश्‍न मेरे मन में बार-बार उठ आता है कि तुमने किसी से सीखा होगा, तुम्हरा कोई गुरू होगा। अगर तुम्हारे गुरू जीवित हों तो एक बार उनका संगीत सुनना चाहता हूँ, उन्हें दरबार बुलाओ।”

तानसेन ने कहा, “ये ज़रा कठिन बात है। गुरू मेरे जीवित हैं, लेकिन उन्हें बुलाना मुश्किल है। वे फ़क़ीर आदमी हैं।”

फ़क़ीर हरिदास उनके गुरू थे।

“वे गाते हैं अपनी मौज से, बजाते हैं अपनी मौज से, क्योंकि वो आदमियों के लिए नहीं बजाते और आदमियों के लिए नहीं गाते। वो परमात्मा के लिए गाते और परमात्मा के लिए बजाते हैं। तो जब उनकी मौज होती है तब। और दरबार में तो उनको न लाया जा सकेगा। फ़रमाइश पर तो वो गाते ही नहीं, गा ही नहीं सकते। वो कहते हैं, “परमात्मा करे फ़रमाइश तब मैं गाता हूँ।” इसलिए ज़रा मुश्किल है। आप चलने को राज़ी न होंगे, उन्हें लाया नहीं जा सकता। और ये भी कुछ पक्का नहीं है कि वो कब गाएँ, रोज उनका कुछ बँधा हुआ नियम नहीं है।”

प्रार्थना के कहीं बँधे हुए नियम हो सकते हैं! प्रेम के कहीं बँधे हुए नियम हो सकते हैं! प्रेम तो सब नियम तोड़ के बहता है। प्रेम तो बाढ़ की तरह है… कूल-किनारे सब तोड़ देता है।

“तो कभी वो दो बजे रात उठ आते हैं और गाते रहते हैं, गाते रहते हैं, घण्टों बीत जाते हैं, सूरज निकल आता है, दोपहर हो जाती है और मस्त नाचते रहते हैं। और कभी दो-चार दिन सन्नाटा ही रहता है, उनके झोपड़े पर कोई स्वर नहीं उठता। कभी शून्य का नैवेद्य चढ़ाते परमात्मा को, कभी संगीत का चढ़ाते हैं, मगर ये सब अनिश्‍चित है।”

हरिदास स्वतंत्र वृत्‍ति के, स्वच्छंद हैं, संन्यासी हैं।

संन्यासी का अर्थ ही होता है स्वच्छंद, जो अपने भीतर के छंद से जीता हो।
अकबर ने कहा कि, “तुमने मुझे और लुभा दिया। सुनना तो होगा ही, कुछ भी उपाय हो। तुम पता लगाओ। मैं आधी रात भी चलने को राज़ी हूँ।”

लेकिन तानसेन ने कहा, “एक और आख़िरी बात झंझट की है कि अगर कोई पहुँच जाए, वो तत्‍क्षण रुक जाते हैं, चुप हो जाते हैं। तो चोरी से सुनना पड़ेगा। झोपड़े के बाहर छिप के सुनना पड़ेगा. हम जब उनके विद्यार्थी भी उनके पास थे तो छिप के ही सुनते थे। हमें सिखाते थे, वो तो ठीक था। लेकिन जब वो ख़ुद अपनी मस्ती में, अपनी रौ में आते थे, तो हमें छिप कर सुनना पड़ता था। सामने पहुँच जाओ, वो रुक जाते। बात ही गई।

तो रात अकबर ने और तानसेन ने, दो बजे रात, छिप गए हरिदास के झोपड़े के पास। वे आगरा में यमुना के किनारे रहते थे। तीन बजे रात वो अपूर्व संगीत शुरू हुआ हरिदास का। अकबर डोलने लगा। उसकी आँख से आँसू ही बहे जाते। पाँच बजे बन्द हुआ संगीत। जब वे लौटने लगे महल की तरफ़, तो अकबर बिल्कुल चुप रहा, कुछ बोला ही नहीं। ये बात कुछ ऐसी थी कि इसके संबन्ध में कुछ भी कहना छोटा होगा, ओछा होगा। ये इस जगत का संगीत न था। ये सेज परमात्मा के लिए बिछाई गई थी। ये श्रृंगार परमात्मा के लिए किया गया था। ये तो बात ही अलौकिक थी। ये अपार्थिव थी बात। ये स्वर्ग का संगीत था। इसके संबन्ध में क्या कहो! कुछ कहने को न था। एक सन्नाटा रहा।

जब महल आ गया और अकबर उतर के महल की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा और उसने तानसेन को विदा दी, तब उसने इतना ही कहा, “तानसेन, अब तक मैं सोचता था, तुम्हारा कोई मुक़ाबला नहीं है; आज मैं सोचता हूँ, तुम्हारे गुरू के सामने तुम तो कुछ भी नहीं हो। आज मैं बड़ी बेचैनी में पड़ गया हूँ। अब तक सोचता था, तुम्हारे सामने कोई कुछ भी नहीं है; आज बड़ी मुश्किल हो गई है। आज तुम्हें देखता हूँ तो तुम्हारा संगीत तो साधारण मालूम होता है। तुम्हारे गुरू के सामने तो तुम कोई भी नहीं हो, कुछ भी नहीं हो। तुम्हारा उनसे क्या मुक़ाबला! अब तक सोचता था तुम्हारा कोई मुक़ाबला नहीं; अब सोचता हूँ तुम्हारा उनसे क्या मुक़ाबला! इतना फ़र्क़ क्यों है? और जो तुम्हारे गुरू के जीवन में हो सका, तुम्हारे जीवन में क्यों नहीं हो पाया?”

तानसेन ने कहा, “कठिन नहीं है मामला, सीधा-साफ़ है। मैं बजाता हूँ आपके लिए; मेरे गुरू बजाते हैं परमात्मा के लिए। मैं बजाता हूँ कुछ पुरस्कार पाने के लिए। छुद्र पुरस्कार… धन, पद, प्रतिष्‍ठा। मेरे गुरू बजाते हैं अहोभाव से, किसी पुरस्कार को पाने के लिए नहीं। मैं बजाता हूँ, कुछ पाने के लिए; मेरे गुरू बजाते हैं क्योंकि उन्होंने कुछ पा लिया है। उस पाने से बजना उठता है। मैं तो भिखारी हूँ, वे सम्राट हैं।”

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