हे मानस के ” राजहंस ” तुम भूल न जाना सांभर आने को ….
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सांभर झील में आए तीन लाख “राजहंसों “का जाने इतिहास
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जितेन्द्र सिंह शेखावत
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सांभर झील में करीब तीन लाख राजहंसों ने डेरा डाल कर सांभर को पर्यटन नगरी बना दिया है।
पर्यटन विभाग के सहायक निदेशक उपेन्द्र सिंह शेखावत के मुताबिक पर्यटन उत्सव के तहत करीब पांच लाख पर्यटकों ने झील की सैर कर शक्ति पीठ शाकम्भरी माता के दर्शन किए हैं। समाज सेवी व पत्रकार कैलाश शर्मा सांभर वाला ने बताया कि महाभारत आदि में राजहंस को नल और दमयंती के संदेशों को एक दूसरे तक पहुंचा परस्पर प्रेम उत्पन्न करने वाला पक्षी बताया है।
संस्कृत साहित्य में राजहंस को पवित्रता, ज्ञान, विवेक, प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक माना है। संसार में केवल राजहंस ही दूध और पानी अलग करने की क्षमता रखता है। उच्च आदर्शों के साथ आध्यात्मिक के मार्ग का ज्ञान प्रदान करता है ।
संस्कृत विद्वान डा सुभाष शर्मा के मुताबिक शास्त्रों में राजहंस को ब्रह्मा और सरस्वती गायत्री का वाहन माना है । कालिदास कृत ‘विक्रमोर्वशीयम्’ जैसे नाटकों में प्रेम,विरह और मन के संदर्भ में राजहंस को महत्व दिया है ।
पंचतंत्र मे इसे विवेक और बुद्धि के प्रतीक के रूप में माना है
‘लहरों के राजहंस’ नाटक में राजहंस को चेतना यात्रा का प्रतीक माना है.
फिनलैंड ,यूरोपीय देशों के कैस्पियन सागर ,जापान चीन व मंगोलिया से आने वाले राजहंस की पूंछ गुलाबी होने के कारण सांभर झील का जल गुलाबी दिखाई पड़ता है।
हिंदी साहित्य और भारतीय परंपरा में राजहंस एक पक्षी नहीं बल्कि शक्ति का प्रतीक माना है
।हिंदू धर्म में माना जाता है कि पवित्र आत्माएं राजहंस की योनि में कुछ समय बिताने के बाद फिर मनुष्य योनि में या फिर मोक्ष प्राप्त करती है । इसलिए राज हंस को सर्वोच्च आत्मा का प्रतीक माना है । तपस्या में लीन ऋषि मुनि हंस का रूप धारण कर मानस हंस में निवास करते हैं । ऋषि अत्री ने हंस का रूप धारण किया था । मान्यता है कि कोई युद्ध में जा रहा है और उसे हंस दिखाई दे तो उसकी जीत पक्की है ।
पर्यटन अधिकारी रहे गुलाब सिंह राठौड़ ने बताया कि पिछले साल राजहसों की मृत्यु के बाद
मीठड़ी में चिकित्सालय खोला गया है। ।
( नई पीढ़ी को इतिहास का ज्ञान कराने के लिए इस स्टोरी को आगे ग्रुप में बढ़ाने की कृपा करावें )
sabhaar राजस्थान पत्रिका जितेन्द्र सिंह शेखावत
